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बिसकरमा जयंती

  बिसकरमा जयंती - सरसी छन्द तइहा ले करते आवत हस, निरमाणन के काज। आज तुँहर हे जनम-जयंती, बिसकरमा महराज। सबले पहिली तहीं मढ़ाये, भिथिया मा मेयार। मुड़का ला पटिया बोहाये, ठोंके काँड़ उतार। कमरगाह बाँधे काँड़न मा, घर के तहीं सियान। कमचिल चिरके भदरी गाँथे, छाये नलिया-पान। जिनगानी बर छँइहा-छानी, मुड़ माथा बर ताज। आज तुँहर हे जनम-जयंती, बिसकरमा महराज। तुँहर सिखाये कामकाज ले, मिलिस हाथ ला काम। घर-परिवार चलाये खातिर, मिले लगिस कुछ दाम। रोजगार ले रोजी-रोटी, कपड़ा मान मकान। दुख होथे गा नइ मिल पाइस, सबला एक समान। अपरिद्धापन के हे भगवन, कुछ तो होय इलाज। आज तुँहर हे जनम-जयंती, बिसकरमा महराज। आज बनत हे महल अटारी, मोटर गाड़ी रेल। महिनत बाँचत हे मशीन ले, सिरजन होगे खेल। आशीर्वाद तुँहर हे सरलग, संग हवय विज्ञान। पहुँचे हन चन्दा मामा घर, चढ़ के चन्दर-यान। आनंदित हे आभारी हे, इंजीनियर समाज। आज तुँहर हे जनम-जयंती, बिसकरमा महराज। रचना- सुखदेव सिंह"अहिलेश्वर" गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़ 
 "" सुखदेव के करुण स्वर "" सुमता सलाह के भाखा भुला गे  लागत हे मती म मिरचुक हमा गे साफ दिखत हे सुवारथ के सौदा  सच्चा ठगा गे अउ लबरा फभा गे  कुमता के आगी अउ झगरा के आँधी संघरा आही शहर गाँव लेसा जाही चारो मुड़ा राखे राख नजर आही मुआ मानवता बर महुरा धरे हे बोली म गोली बारूद भरे हे रोज मतरथे बुजा मती माथा केत बरोबर तो पाछू परे हे भेर भरम घर घर म सुलगाही घर परिवार समाज नठा जाही चारो मुड़ा राखे राख नजर आही चिन्हव चिन्हव ये अमरबेल मन ल जानव ढेकुना किरनी मनके परन ल चुहके न पावँय अब लहू कहूँ के हम ला बचाना हे अपन चमन ल बिना कमाये इन खाहीं अघाहीं हमर बिरवा ठाढ़े ठाढ़ सुखा जाही चारो मुड़ा राखे राख नजर आही रचना- सुखदेव सिंह"अहिलेश्वर"
 वियोग श्रृंगार - बादर म मोर चन्दा अँधियार म जिये बर जिनगी नठा गे हे। बादर म मोर चंदा जब ले लुका गे हे। चौरा म बइठे बइठे बेरा पहा जथे। बिन खाय एक दू दिन भूखे रहा जथे। न काल के हे चिन्ता न आज के फिकर सिरतो न कुछ सुहावै संगवारी के बिगर जैसे कुआँ म सपना जा के झपा गे हे। बादर म मोर चंदा जब ले लुका गे हे। चल देहे दू ठो छौना कोरा म छोड़ के ए मन हे मोर बर गा लाखों करोड़ के जिये ल परही मोला इकरें भविष्य बर सुरता ओकर रोवाही भलते धरर धरर सुख मा चलत ये जिनगी दुख मा धँधा गे हे बादर म मोर चन्दा जब ले लुका गे हे रचना - सुखदेव सिंह"अहिलेश्वर" गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
 बाल कविता "आगे सोला जून" जून! जून! जून! आगे सोला जून। कटवाये बर बाल, जाहूँ मँय सेलून। बाबू जी के साथ। धरके ओखर हाथ। मिलही फेरे यार। घूमे बर बाजार। खूब किंजरहूँ हाट। खाहूँ गुपचुप चाट। खाहूँ फर अंगूर। केरा सेव जरूर। चाही मोला जेन। कापी पुस्तक पेन। लेही बाबू मोर। झन तँय दाँत गिजोर। -सुखदेव सिंह"अहिलेश्वर" "आजा आजा नानी" आजा आजा नानी मँय हर देहूँ पानी तँय हर देबे मोला मीठ कलिन्दर चानी साबून मा नहवाबे गुरतुर गाना गाबे अम्मा हा खिसियाथे मोला तँय सम्हराबे खुश हो खाना खाहूँ नइ मँय कभू रिसाहूँ झटपट बस्ता धरके कुलकत इस्कूल जाहूँ -सुखदेव सिंह "अहिलेश्वर" " छा जा बादर छा जा " छा जा बादर छा जा। धर के आजा बाजा। खेल खेल मा मैं हा,  आज बने हॅंव राजा। तोला कहिथें दानी। बरसा देना पानी। पटपट पटपट बाजय, घर के खपरा छानी। छानी के सब पानी। ॲंगना मा सकलावय। मोर नानकन ॲंगना, टम टम ले भर जावय। घानी मूनी घानी। खेला आनी बानी। छपक छपक छप मनभर, खेलय मुनिया रानी। -सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर'' बाल कविता आना संगी आना। संगे खाबो खाना। बुआ बनावय रोटी। बेलत ह...
 #बोरे बासी (लावणी छन्द) एक मई मजदूर दिवस ला, सँहुराही बोरे बासी। नून गोंदली सो बतियावत, मुस्काही बोरे बासी। कय प्रकार के होथे बासी, प्रश्न परीक्षा मा आही। काला कथें तियासी बासी, लइकन सो पूछे जाही। रतिहाकन के बँचे भात मा, पानी डार रखे जाथे। होत बिहनहा नून डार के, बासी रूप भखे जाथे। नौ दस बज्जी भात राँध के, जल मा जुड़वाये जाथे। बोरे बासी कहत मँझनिया, अउ संझा खाये जाथे। बोरे बासी बाँच कहूँ गय, दूसर दिवस बिहनहा बर। उही तियासी बासी आवय, गाँव गरीब किसनहा बर। बिन सब्जी के दुनो जुहर ला, नहकाही बोरे बासी। नून गोंदली सो बतियावत, मुस्काही बोरे बासी। छत्तीसगढ़ सरकार दिखावत, हावय छत्तीसगढ़िया पन। अच्छा हे सबके तन मन ला, भावय छत्तीसगढ़िया पन। बात चलत हे गोबर आँगन, खेत खार घर बारी के। नरवा गरुवा घुरुवा मनके, संरक्षण रखवारी के। बड़ गुणकारी होथे बासी, घर बन सबो बतावत हें। नवा खवइया मन भलते, बासी खा के जम्हावत हें। एक सइकमा बोरे बासी, कय रुपिया मा आही जी। होटल मन मा बहुते जल्दी, मेनू कार्ड बताही जी। जिलाधीश नेता मंत्री खुश हो खाहीं बोरे बासी। नून गोंदली सो बतियावत, मुस्काही बोरे बासी। छप्पन भोग सुन...

ठिठुरन (नवगीत)

 ठिठुरन (नवगीत) बात बाकी रह गयी ठिठुरन भरी उस रात की। दर्द देती आज भी है याद उस आघात की। चल रही ठण्डी हवा थी हौसलों को तोड़ने। ज़िन्दगी भी डट गयी थी,सॉंस साहस जोड़ने। टूट पड़ना था उसे शंका कहाँ थी मात की। बात बाकी रह गयी ठिठुरन भरी उस रात की। ज़िन्दगी कँप जग रही थी,आसमाँ की छाँव में। कोशिशें ठिठुरी पड़ी थी,क्या शहर क्या गाँव में। दुर्दशा को स्मृति करें क्या उस बुरे हालात की। बात बाकी रह गयी ठिठुरन भरी उस रात की। कौन समझाता रहा है?मूल्य उसको वोट का। कौन दिखलाता रहा है?घाव उसको चोट का। कौड़ियों के तुल्य कीमत आज भी औकात की। बात बाकी रह गयी ठिठुरन भरी उस रात की। सर्द ठण्डी रात मे जब कँप रही थी जिन्दगी। जुड़ गये थे हाथ समझो, हो रही थी बंदगी। हो रहा था भ्रम खुदा को कष्टदायक बात थी। बात बाकी रह गयी ठिठुरन भरी उस रात की। ओज फैले सूर्य का आलोक चारों ओर हो। तोड़ने बेड़ी तमस की आसरे सा भोर हो। राह तकती जिन्दगी अब इक नई शुरुवात की। बात बाकी रह गयी ठिठुरन भरी उस रात की। रचना- सुखदेव सिंह "अहिलेश्वर" गोरखपुर, कबीरधाम, छत्तीसगढ़                 
 जागृति पंथी गीत आरो लेवत हे औंराबाँधा के माटी बाट जोहत हे बोड़सरा के माटी---२ का बुता म भुलाये हव..... एकता ल छोड़ के अघुवा बेटा, तिड़ी-बिड़ी छरियाये हव। एकता ल छोड़ के बघवा बेटा, तिड़ी-बिड़ी छरियाये हव। १. बैरी दुश्मन रोज भिड़े हें, आपस म लड़वाये बर। खूब रचे हें भूल-भुलैया, रस्ता ले भटकाये बर। चिंता करत हे चटुवापुरी के माटी रोज गुनत हे गिरौदपुरी के माटी---२ का चाही का पाये हव एकता ल छोड़ के अघुवा बेटा, तिड़ी-बिड़ी छरियाये हव। एकता ल छोड़ के बघवा बेटा, तिड़ी-बिड़ी छरियाये हव। २ नइहें कोनो हितवा मितवा, मया खँड़ा गे हे जाती मा। कहाँ ले निर्मल मया उपजही, बोली ठकुर सुहाती मा। खोज करत हे खड़ुवापुरी के माटी खबर पुछत हे खपरीपुरी के माटी---२ कामा चेत लगाये हव एकता ल छोड़ के अघुवा बेटा, तिड़ी-बिड़ी छरियाये हव। एकता ल छोड़ के बघवा बेटा, तिड़ी-बिड़ी छरियाये हव। ३. सुरता करलौ रोज सुमरलौ राजागुरू बलिदानी ला। हिरदे मा गठिया के धरलौ गुरू घासी के बानी ला। संसो करत हे भंडारपुरी के माटी संग हे तेलासीपुरी के माटी कोन डहर सुध लमाये हव एकता ल छोड़ के अघुवा बेटा, तिड़ी-बिड़ी छरियाये हव। एकता ल छोड़ के ...
 पंथी गीत मॅंय तो पबरित चरण मनावॅंव गुरू के मोर..आरती वंदना ल गावॅंव गुरू के मोर आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस बबा के मोर आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस मॅंय तो चरणों में माथ नवावॅंव गुरू के मोर..आरती वंदना ल गावॅंव गुरू के मोर आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस बबा के मोर आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस पुरुषपिता ले जीव जगत पुकारे गुरू बिन कोन दुख विपदा ल टारे--कोरस गिरौदपुरी म बाबा लिए अवतारे ज्ञान अमरित देके हंसा ल उबारे---कोरस उही ज्ञान अमरित महूॅं पावॅंव गुरू के मोर..आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस बबा के मोर आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस चंदन घोरि घोरि ॲंगना लिपावॅंव गज मोति अन कर चौंक पुरावॅंव--कोरस हिरदे कमल बीच गदिया लगावॅंव ओहि गदिया म सतगुरू ल पौढ़ावॅंव--कोरस मॅंय तो मन भर दर्शन पावॅंव गुरू के मोर..आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस बबा के मोर आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस गुरु मोर ज्ञानी कर हे अमरित पानी सुने हावॅंव मैं ह सबो संत के जुबानी..कोरस बिना भेद-भाव बाबा करे हे सियानी सबो बर मीठ मया मीठ मीठ बानी..कोरस गुरु गुन गा के आशीष पावॅंव गुरू के मोर...आरती वंदना ल गावॅंव---कोरस बबा के मोर आरती वंदना ल गावॅंव-...
जसगीत महिमा ला गावॅंव तोर ओ, दाई तैं मोर सहारा। सेवा ला गावॅंव तोर ओ, दाई तैं तोर सहारा। तोर दया किरपा जिनगी भर, पावॅंव सुख उजियारा। महिमा ला गावॅंव तोर ओ, दाई तैं मोर सहारा। जननी बनके जनम दिये तैं, बहिनी बनके राखी। बेटी बन ॲंगना मा फुदके, हरसिस हिरदे ऑंखी। तोरे ॲंचरा के छइहॉं मा, दुलरावय जग सारा। महिमा ला गावॅंव तोर ओ, दाई तैं मोर सहारा। जनम-भूमि दाई तोर कोरा, आइन ज्ञानी ध्यानी। नॉंव अमर करके चल देइन, सत के छोड़ निशानी। सरी जगत के तरणतारिणी, तैं गंगा के धारा। महिमा ला गावॅंव तोर ओ, दाई तैं मोर सहारा। तोर बिना सृष्टि के रचना, दाई निचट अधूरा। तोर दया किरपा दुनिया के, सपना होथे पूरा। धरती ले आकाश तलक तोरे गूॅंजय जयकारा। महिमा ला गावॅंव तोर ओ, दाई तैं मोर सहारा। -सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'
  बहर आधारित गीत 212 212 212 212 नोनी के दाई सुनतो ओ सुन ए डहर छोड़ना पर जही लागथे गॉंव घर नइये रोजी-मजूरी इहॉं गॉंव मा चल चली चल चली चल चली ओ शहर कपड़ा-लत्ता बिसाई के कापी कलम दिन गुजारी कतिक नून चटनी मा हम ये दरिदरी गरीबी ये फुटहा करम घाले बर लगथे खाये हे किरिया कसम दू हथेरी के खेती हे जरगे फसल चेत कउवा गइस झुॅंझरियागे नजर नइये रोजी-मजूरी इहॉं गॉंव मा चल चली चल चली चल चली ओ शहर... नोनी के दाई....। मुड़ धरे रोज बइठे म बनही कहॉं बिन मजूरी के घर पेट चलही कहॉं कर्जा कर कर गुजारा चलाई कतिक रोज कर्जा उधारी ह मिलही कहॉं कर्जा-बोड़ी ले उधियार होना हवय नइते कर्जा चगल जाही खेती हमर नइये रोजी-मजूरी इहॉं गॉंव मा चल चली चल चली चल चली ओ शहर...... नोनी के दाई...। काम-बूता के अंकाल नइहे उहॉं गॉंव कस हाल बेहाल नइहे उहॉं गॉंव छोड़े के दुख हा रोवाही भले मनखे मजबूर कंगाल नइहे उहॉं रोज खाबो कमाबो बचाबो घलो कहिथें होथे शहर मा हुनर के कदर नइये रोजी-मजूरी इहॉं गॉंव मा चल चली चल चली चल चली ओ शहर... नोनी के दाई....। रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

कुण्डलिया छन्द - सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'

  1-कुण्डलिया - निज भाषा आवश्यक अनिवार्य है, बहुभाषा का ज्ञान। पर निज भाषा के लिए, मॉं सम हो सम्मान।। मॉं सम हो सम्मान, नित्य व्यवहृत हो सादर। स्वत: मिले ऐ मित्र, मातृभाषा को आदर। इसका नहीं विभेद, अल्पसंख्यक बहुसंख्यक। निज भाषा का मान, प्रथमत: है आवश्यक। 2-कुण्डलिया - बॅंटवारा बॅंटवारा के हेतु में, था घर ऑंगन खेत। बिन बॉंटे मन बॅंट गया, माता-पिता समेत। माता-पिता समेत, बॅंट गये रिश्ते नाते। बॅंटे खाट घर-घाट, भावनाऍं जज्बातें। दो हिस्सों में बॉंट, लिया जैसे जग सारा। संतानों के बीच, हुआ ऐसा बॅंटवारा। 3- कुण्डलिया - हो रही दिनभर वर्षा वर्षा पर आश्रित फसल, फसलों पर खलिहान। खलिहानों पर मंडियॉं, लख लख मॉल दुकान। लख लख मॉल दुकान, रसोई घर हर घर के। फिर आश्रित हर पेट, गॉंव के शहर-नगर के। वर्षा बिना दिमाग, गया था कहीं ठहर सा। मन अब हुआ प्रसन्न, हो रही दिनभर वर्षा। 4-कुण्डलिया - धोयें अपना हाथ भोजन के पहले सदा, और शौच के बाद। साबुन से अच्छी तरह, धोयें अपना हाथ। धोयें अपना हाथ, तभी तो स्वस्छ  रहेंगे। तन मन होगा स्वस्थ, तभी तो खूब पढ़ेगे। है यह सुन्दर ज्ञान, न समझे...
 मीरा बाई चानू टोक्यो ओलंपिक ले पहलिच दिन खुशखबरी आइस हे। भारोत्तोलन मा जब सिल्वर, मेडल मीरा लाइस हे। हमर देश के खेल रतन ए, बेटी हमर पदमश्री ए। बेटी मन बर उज्जर सपना, साहस ए शाबाशी ए। माई के मुस्कान हरय, बेटी बाबा के हॉंसी ए। मणिपुर के मस्तक के मोती,गरब हमाये ऑंखी ए। भारत के बेटी ले बेटी, माई गौरव पाइस हे। भारोत्तोलन मा जब सिल्वर,मेडल मीरा लाइस हे। तारिख आठ अगस्त महीना, उन्नाइस सौ चौरनवे। मीरा बाई चानू जी के, जनम दिवस अब याद हवे। साइखोम कृति मैताई ए, पापा देश दुलारी के। नाव ओंगबी तोम्बी लीमा, मीरा के महतारी के। बचपन वाले भार बॉंस के, बेटी ला सॅंहुराइस हे। भारोत्तोलन मा जब सिल्वर, मेडल मीरा लाइस हे। कामनवेल्थ एशियन मा हे, पदक रजतिया सोना के। वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग मा हावय, सोना बिटिया सोना के। दो हजार इक्कीस बछर ए, गुजर गइस इक्कीस बछर। भारोत्तोलन मा आइस हे, ये दुसरइया मेडल घर। बेटी सन मा खुशी मनावत, देश मिठाई खाइस हे। भारोत्तोलन मा जब सिल्वर, मेडल मीरा लाइस हे। रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
 सतनाम आरती  होवत्थे गुरु के आरती होवत्थे गुरु के आरती सत भजन मा ..होवत्थे गुरु के आरती सत भजन मा शब्द सुमन चरनन म चढ़त हे 2 अंतस भितरी म आसन लगत हे 2 लमत्थे सत सुरती, बनत्थे सर्व सम्मति संत जनन मा..होवत्थे गुरु के आरती सत भजन मा पुरुष पिता मोर हिरदे बिराजे 2 मन प्रफुलित तन आरती साजे 2 नचत्थे भाव भगती, पटक पाँव धरती पंथी धुनन मा..होवत्थे गुरु के आरती सत भजन मा  सतगुरु घासी बाबा गिरौद निवासी घट घट वासी मोर गुरू सुखराशी कृपा करे हे महती, दिखे हे भाग जगती  सत्य गुणन मा..होवत्थे गुरु के आरती सत भजन मा होवत्थे गुरु के आरती,,होवत्थे गुरु के आरती सत भजन मा,,होवत्थे गुरु के आरती सत भजन मा रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' गोरखपुर,कबीरधाम छत्तीसगढ़
 "सूरुज सम सुखदाता संविधान निर्माता" लोकतंत्र पाये तैं पाये पद ला भाग्य विधाता के। संगवारी सुध सुरता करले, संविधान निर्माता के। चौदह अप्रेल अठ्ठारह सौ इन्क्यानवे ईसवी सन। भीमराव के जनम भइस ॲंधियारी रात पहाती कन। विश्वरतन के पिता रामजी सुबेदार सकपाल कहॅंय। बाबा साहब ला माता भीमाबाई के लाल कहॅंय। बचपन ले संघर्ष डगर के, पथरीला रस्ता रेंगिस। संविधान के बॉंध बना के, सुख के जलधारा छेंकिस। मध्यप्रदेश महू के माटी, गुण गाथे जे नाता के। संगवारी सुध सुरता करले, संविधान निर्माता के। भाग्य-वाद ला भेद बताइस, महिमा भागीदारी के। चिन्ह्वाइस चलके देखाइस, चौखट करम दुवारी के। शिक्षा समानता समता सुख के घर काला कहिथे जी। पुरुषारथ के परदरशन बर अवसर काला कहिथे जी। भारत के बढ़वार बड़ाई अउर भलाई कइसे हे। ऑंखी ला अलखाइस देखाइस के देखव दइसे हे। थके घमाये शोषित मनके, छानी छइहॉं छाता के। संगवारी सुध सुरता करले, संविधान निर्माता के। दफ्तर के दरवाजा-फइका, खुलगे अक्कल अलमारी। खुर्शी मा बइठे खुश हावयॅं, सबन जाति के नर नारी। सिपचाये ले अब नइ सिपचय, जात-धरम के चिंगारी। भारत माता के लइकन मा, देखे लाइक हे यारी। प...
 कलम उठाकर थूक दिया मन में घर में जलता दीपक, तमराजों ने फूक दिया। बारूदी बंदूक उठाकर, धड़धड़ धड़-धड़ धूक दिया। उग्रवाद आतंकवाद इन नक्सलवाद पिशाचों के, कायर चेहरे पर मैंने भी कलम उठाकर थूक दिया। -सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर''

पंथी गीत

  पंथी गीत एक-ठन हे दवाई तोर उदासी के। तैं शरण मा आजा गुरू घासी के। दुनिया जगत ला घुम-घुम देखे। हित अनहित सच झूठ सरेखे। नइये* कोनो कटइया चौरासी के। तैं शरण मा आजा गुरु घासी के। जाति बरण के भेद मिटाए। मनखे मनखे ल एक बताए। ओ कुपरथा जरोए दास-दासी के। तैं शरण मा आजा गुरू घासी के। बइठ-बिगारी ल अनीति बताए। बिधवा-बिहाव ल सहीं ठहराए। अधिकार देवाए सुख हॉंसी के। तैं शरण मा आजा गुरू घासी के। बाबा के उन्नत खेती के तरीका छत्तीसगढ़ बने धान कटोरा अब कमी नइहे रोटी भात बासी के। तैं शरण मा आजा गुरू घासी के। हिरदे के धरती म सत बीजा धर। समता सुमत सुख पा जिनगी भर। समे नाके झन बाउॅंत बियासी के। तैं शरण मा आजा गुरु घासी के। इही लोक संग परलोक सुधरही। सार जिनिस अंतस मा उतरही। सत भजन ल कर अविनाशी के। तैं शरण मा आजा गुरु घासी के। रचना-सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर'' गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
चित्र
  तीज तिहार-  "गुरू परब गुरु घासीदास जयन्ती" सियारी सकला गे रहिथे धनइया दाई के पबरित पॉंव ह गाॅंव म परगे रहिथे ओन्हारी खेती म बोंवागे रहिथे किसान के कोठी म धान भरे के बाद ओखर मन ह भरे भरे लगत रहिथे।खोर गली के सुघराई मन ला मोहत रहिथे जाड़ के जनाती अउ नवम्बर के जाती म छत्तीसगढ़ के भुइॅंया ह कोरा म खेलाय अपन दुलरुवा सपूत घासीदास के सुरता करे लगथे अउ तब शुरू होथे दिसम्बर के पावन पबरित महिना। छत्तीसगढ़ म दिसम्बर ल गुरू परब के महिना कहे जाथे। छत्तीसगढ़ के धरती म पावन धाम गिरौदपुरी हे जिहॉं महान संत गुरु घासीदास के अवतरण माता अमरौतिन अउ पिता संत महॅंगूदास बाबा के घर 18 दिसम्बर सन् 1756 के होय रहिस। बाबा गुरु घासीदास ह अपन जप तप सत के बल म बहुत अकन महिमा देखाइस संगे संग मनखे मन ल सत्य अहिंसा दया करुणा महिनत सुमता समता के राह रस्ता देखाइस आपस म भाईचारा के साथ रहे ल सिखाइस। बाबा गुरु घासीदास आज पूरा विश्व बर वंदनीय हे। बम अउ बारूद के मुॅंह म खड़े मुॅंह चलावत विश्व समुदाय बर गुरु घासीदास बाबा जी के बताए सत अउ शान्ति के मारग ह हर हाल अनुकरणीय हे। वइसे तो पूरा छत्तीसगढ़ बाबा गुरु घासीदा...
  छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन 2122  1122  22 शक्ति पहिचान गुरू घासी के सत्य ला जान गुरू घासी के हे सरल सार सुलभ हितकारी बोधमय ज्ञान गुरू घासी के झूठ ठहरै न कभू माथा मा गोठ ला मान गुरू घासी के दुख बिपत्ती के भॅंवर टल जाही तॅंय लगा ध्यान गुरु घासी के आज संकर किसिम कहावत हे चुरकी भर धान गुरू घासी के बागवानी म चलत हे आजो जर तना दान गुरू घासी के मनखे मनखे म कहॉं हे अंतर नाक मुॅंह कान गुरू घासी के जेन ब्रम्हाण्ड पिता पालक ए एक भगवान गुरू घासी के भक्त सुखदेव पिके ज्ञान अमृत करथे जयगान गुरू घासी के रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
 विषय-लकर-धकर विधा-सार छंद खेत डहर ले आ के घर मा, तुरते ददा तियारे। दू दल हबरे हवय बेंदरा, जातो बेटा जा रे। सुनते साठ पहिर के चप्पल, खेत डहर दउड़े हॅंव। टीप छुवाउल कस नदिया के, खेत पहुॅंच तउॅंड़े हॅंव। पिच्च पिच्च एती ले ओती, कूदय बिकट पिलारी। एक हाथ मा उठा टप्प ले, पा लेवय महतारी। आठ मॅंझोला एती-तेती, किचकिच किचकिच दउड़ॅंय। छरियाये बॅंबरी मा चढ़के, कूदॅंय दउड़ॅंय तउड़ॅंय। बइठे निधक करय जी खिसखिस, मेड़ उपर मा हुॅंड़का। आवय अपन बेंदरा दल के, मालिक मुखिया मुॅंड़का। कोरी दू कोरी ले जादा, बॅंटा बॅंटा के बगरे। हुॅंड़कीमन मुॅंह देखत काहॅंय, लइका सो झन लग रे। कोनो मन भाॅंटा मा बइठे, कोनो मिरचा खावॅंय। कोनो मन बरबट्टी सेमी के पाना ला भावॅंय। दउॅंड़ाये मा दउॅंड़ चङ्ग ले, पेंड़ उपर चढ़ जावय। कोनो मसमोटिहा पपीता झाड़ी ला ढलगा दय। कोहा जेन सोझ मा जावय, खुद ला तुरत हटा लय। मुक्काबाज सहीं मुॅंह माथा, पक्का अपन बचा लय। हुय्या हुय्या कहत कहत मुॅंह,माथा मोर पिरागे। कोहा मारत मारत थक के, बेंवा पाॅंव थिरागे। ददा ढेखरा मा गुलेल ला, गेये हे अरझा के। कोहा फॅंसा फॅंसा गुलेल मा, मारॅंव हाथ भॅंवा के। बाजिस...
"आडम्बर" विधा-छन्द हे विद्वतजन शीघ्र बहा दो आडम्बर को नाली में। भूख गरीबी परोसता है यह मानव की थाली में। माना मानस सदियों से कुछ आडम्बर की आदी है। पर यह सच है तन मन धन जन की इसमें बर्बादी है। स्वस्थ रीति के संग चलो तुम समय खड़ा अभिनन्दन में। प्रेम दया सद्भाव सुमत नित व्यवहृत हो जन गण मन में। व्यर्थ गॅंवाओ समय न यूॅं आडम्बर की रखवाली में। हे विद्वतजन शीघ्र बहा दो आडम्बर को नाली में। वैज्ञानिकी विचार भरो बचपन के मन में बस्ते में। मानवतावादी स्लोगन लिख टाॅंगो उसके रस्ते में। प्रौढ़ युवा समृद्ध दिखें नित नैतिक नेक विचारों से। ऋतुओं सा सहयोग मिले नित जनता को सरकारों से। नववधुऍं पहले ही दिन से पॉंव धरें खुशहाली में। हे विद्वतजन शीघ्र बहा दो आडम्बर को नाली में। अच्छा होता दुर्योधन के कान पकड़ खींचा जाता। बीच सभा में दु:शासन भी जोरदार थप्पड़ खाता। सेव पेंड़ जब फले धतूरा दोष नहीं क्यों माली में। हे विद्वतजन शीघ्र बहा दो आडम्बर को नाली में। रचना-सुखदेव सिंह''अहिलेश्वर'' गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़ ahileshver.blogspot.com