संदेश

बरवै छंद बड़े बिहनहा उठके,गे हें खेत। सँघरा नाती बूढ़ा,कर के चेत। जातो जातो बेटी,धर ले पेज। भूँख मरे झन पावैं,लउहा लेज। चलना सँघरा जाबो,हो तइयार। घर ले अब्बड़ दुरिहा,परथे खार। तैं हा धरले पानी,अउ मै पेज। नइ मै जाँव अकेल्ला,झन तैं भेज। कहिके गे हें दाई,बाबू मोर। पढ़े लिखे मा देबे,बेटी जोर। नतनिन के मुँह ले जब,सुनथे गोठ। दादी करथे नतनिन,के मन मोठ। तोर ददा दाई ला,झन सरमेट। गे हें शहर नगर ओ,धर के पेट। सहीं कहे ओ बेटी,गोंदा फूल। ले भइगे अब जा तैं,हर इसकूल। अतका कहिके दादी,चलदिस खार। होगे बस्ता बेटी,के तइयार। दकियानूस सुधारन,लागे भूल। बेटी हाँसत जावत,हे इसकूल। दादी पेज धरे जब,पहुँचे खेत। काम बुता ला देखत,हरगे चेत। तर तर बूँद पसीना,हर चुचुवाय। देख देख अंतस मा,खुशी अमाय। नाती मुंगफली ला,कोड़त जाय। दादा बइठे बइठे,टोरत जाय। बइठय छँइहा मा अउ,पारय रेर। आवव जल्दी खालव,होगे देर। दादी बोरी धरके,जोरत जाय। छिन मा हाँथ गोड़ ला,मोरत जाय। नान्हे मति ले बरवै,लिखे अँजोर। पाठक मन पढ़के ले,लेहू सोर।         रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
चौपई छंद-श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर गणतंत्र का सोभा बरनँव सँहुराँव। खुश हे शहर नगर अउ गाँव। गली मोहल्ला पारा ठाँव। धजा तिरंगा ला पहुँचाँव। हे गणतंत्र दिवस त्यौहार। मन गदगद हे झारा झार। गुँजय तिरंगा के जय गान। जय भारत जय हिन्दुस्तान। सुग्घर संविधान के मंत्र। जेखर ले चलथे सब तंत्र। मानवता समता के यंत्र। सबले बढ़िया हे गणतंत्र। रोटी कपड़ा मान मकान। शिक्षा रोजी पद पहिचान। पूजा नियम धरम अउ दान। सब बर अवसर एक समान। शोषित वंचित जात समाज। आरक्षण पावत हे आज। कोठी मा अब हवय अनाज। फुलत फरत हे लोक सुराज। बोली भाषा भले अनेक। पर सबके अंतस हे एक। सद् विचार सबके हे नेक। अब हे मनखे मनखे एक। जनता होगे हे हुशियार। रेंगय रस्ता ला चतवार। देखय बिगड़े के आसार। लेवय अपने हाथ सँवार। ना लाठी तब्बल तलवार। ना सैना ना सिपहसलार। जनमत बर नइ हे तकरार। जनता अब चुनथे सरकार। बाबा भीमराव गुणवान। तुँहर कलम के लिखे विधान। हवय हमर बर जीव परान। मन के सुख मुँह के मुस्कान। रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर मु.गोरखपुर,कबीरधाम(छत्तीसगढ़)
'अपना विद्यालय सरकारी' नही एक की हम सबकी है, निश्चित नैतिक जिम्मेवारी। सहयोगी बन चलो सँवारे, अपना विद्यालय सरकारी।। अपने ही बच्चे पढ़ते हैं। यहीं भाग्य अपना गढ़ते हैं। पौधों सा नित नित बढ़ते हैं। लक्ष्य सीढ़ियों पर चढ़ते हैं। फिर क्यों इतनी है दुश्वारी... सहयोगी बन चलो सँवारे, अपना विद्यालय सरकारी। कोशिश की ना कोई हद हो। अधिक नही तो एक अदद हो। सहयोग नही हो पाये धन से, तन मन से हर हाल मदद हो। हाथ धरे ना देखें पारी... सहयोगी बन चलो सँवारे, अपना विद्यालय सरकारी। कारज समय सरेख रहा है। आशान्वित हो देख रहा है। है इतिहास गवाह देख लें, योगदान पर लेख रहा है। होती कलम धार दो धारी... सहयोगी बन चलो सँवारे, अपना विद्यालय सरकारी। रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर मु.गोरखपुर,कबीरधाम छत्तीसगढ़
चौपाई छंद- श्री सुखदेव सिंह अहिलेश्वर ""मँय घासी अँव"" धरम करम बिन दिन नइ नाकय।मनखे एला ओला चाकय। गुरु घासी सुरता मा आवय।सब संतन ला ज्ञान लखावय। सुन आ संत बइठ सुसताले।मँय घासी अँव बोल बताले। मै नइ कहँव भजे बर मोला।मै नइ कहँव अमर हे चोला। माटी ले सिरजित हे काया।माटी हे जग माटी माया। इक दिन माटी मा मिल जाना।फिर काहे मनुवा इतराना। बड़ पबरित हे मानुष जोनी।सत बीजा के कर ले बोनी। जात धरम के झन दे ताना।मनखे मनखे एक समाना। पुरुष पिता सतनाम सार हे।जीव ब्रह्म जग सत अधार हे। ज्योति पुरुष के नाम सुमर ले।इहाँ उहाँ बर गठिया धर ले। मान पुरुष के सेत निशानी।झन कर मनुवा आनाकानी। सुनले गुरु के अमरित बानी।होही धन्य जनम जिनगानी। सोना चाँदी माल खजाना।नइ लागय रुपिया ना दाना। अंतस मा सत श्रद्धा धर ले।हाथ जोर सतनाम सुमर ले। नाथ इहें अउ माथ इहें हे।सत कारज बर हाथ इहें हे। समय रहत नेकी नित कर ले।जियते मा भँवसागर तर ले। तर्क करन जानन तब मानन।चौरासी फाँसा पहिचानन। दाना का हे कोन शिकारी।संत सुजन जन कर चिन्हारी। सरसुधिया के सुध ला पा के।ठग-जग बइठे हाट लगाके। चमक-दम...
"निर्धनता" निर्धनता के खेल निराले। तुम भी देखो ऊपर वाले। भूख गरीबी की लाचारी। उम्मीदों पर पड़ती भारी। कभी जिन्दगी जीत न पाई, लड़ी मगर निश्चित ही हारी। मजबूरी बच्चों के सपने। तोड़ रही हाथों से अपने। पहले खोजे भोजन पानी। या गरीब खोजे छत छानी। पड़े पैर मे दुख के छाले। तुम भी देखो ऊपर वाले। झुग्गी मे  बेहाल सभी हैं। छत छानी दीवाल कभी है। लगा बरसने जब भी बादल, सिर ऊपर तिरपाल तभी है। बच्चों को भगवान भरोसे, छोड़ गया वह इत्मिनान से। रखते हों प्रभु पास भले ही, पर बच्चे हैं दूर ज्ञान से। घोर विपत्ती बादल काले। तुम भी देखो ऊपर वाले। स्वप्न अधूरे पक्के कच्चे। देख रहे गरीब के बच्चे। कहलाता भगवान रहा है। बचपन कूड़ा छान रहा है। गायब हुआ पीठ से बस्ता। भूल गया शाला का रस्ता। अब दिन कूड़े मे कटते हैं। बाल राख मे सन लटते हैं। कहते कोई कहाँ?नहाले। तुम भी देखो ऊपर वाले। घिरा हुआ बैठा कूड़े से, हाथों मे कूड़ा कचरा है। बचपन ढूंढ रहा क्या मोती, जो इस कूड़े मे पसरा है। नन्हे हाथों मे क्यों उसके? कापी पुस्तक पेन नही है। बचपन चढ़ विद्यालय जाये, घर के बा...
"दीया जलाहूँ" दाई... दीया जलाहूँ मोला गिनती ले एक ठन जादा दीया दे देबे। गुरुजी कहिथे दीया अउ ज्ञान अँजोर करथे। दीया बाहिर अँजोर करथे  अँधियारी ला हरथे। ज्ञान भीतर अंतस म अँजोर करथे अज्ञानता के अँधियारी ल हरथे। दीया पर्व ज्ञान पर्व आय। दीया दान ज्ञान दान आय। एक ठन दीया ले अनगिनत दीया जलाय जा सकथे। ज्ञान घलो सरलग बगराय जा सकथे। बचपन विद्यार्थी बन विद्यालय म आथे ज्ञान पाथे ज्ञानवान बनथे, तहान सेवा कार्य म लग जथे। उपयोगी सामान बनाथे रेंगत दउड़त जिनगी बर। बिजली,बल्फ छोटे अउ बड़े मशीन,अनगिन चारपाई, जीवन रक्षक दवाई, जरूरी सामान अतका बादर भर बगरे सुकवा, चुरकी भर जुवाँड़ के लाई जतका। दाई.... घठौंदा मा पानी बर गाँव के सबो देवधामी बर पुरखा बर शमसान मा गउ के गउठान मा पुरखौती डीह मा अन्न देवइया महतारी खेती बर पाँच दीया पंच तत प्रकृति बर पुरुषपिता के नाम बर सत के निशानी जैतखाम मा दीया जलाहूँ लहुटत खानी सुरता करके अपन विद्यालय के दुवारी म जिहाँ ले निकले ज्ञान के प्रकाश अनगिनत अंतस मा अँजोर करत आवत हे, दाई...उहाँ एक ठन दीया जलाहू...
सुखदेव सिंह अहिलेश्वर के जयकारी छंद           ''मतदान'' देश करत हावय अह्वान। बहुत जरूरी हे मतदान। मतदाता बनही हुँशियार। लोक स्वप्न होही साकार। लोकतंत्र के जीव परान। मतदाता मत अउ मतदान। मत दे बर झन छूटँय लोग। कहिथे निर्वाचन आयोग। उम्मर हो गय अठरा साल। मतदाता बन करव कमाल। वोटिंग तिथि के रखलौ ध्यान। खच्चित करना हे मतदान। काज जरूरी हे झन टार। वोट ,बूथ मा जा के डार। सीयू बीयू वी वी पेट। बिस्वसनी चौबिस कैरेट। एक बात के राखन ध्यान। शान्ति पूर्ण होवय मतदान। पाछू करबो बूता आन। पहिली करना हे मतदान। अपन व्यवस्था करके जान। जब दे बर  जावन मतदान। पाँच साल मा आय चुनाव। सुग्घर जनमत दे लहुटाव। रचनाकार-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर मुकाम-गोरखपुर कवर्धा छत्तीसगढ़ मोबाइल-9685216602