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छन्द- मधुमालती "जनता तहीं जनतन्त्र के" भजले सुबह ले शाम तैं। मुखले मनुज सतनाम तैं। करके सतत सतकाम तैं। अंतस ल करले धाम तैं। तज दे निराशा डर अपन। हिरदे म साहस भर अपन। धरती अपन अम्बर अपन। फइला उड़े बर पर अपन। हॅंसिया कुदारी धर अपन। हार्वेसटर रीपर अपन। नवनास के नॉंगर अपन। खेती म दे जॉंगर अपन। अवसर हवय तोरो करा। गढ़ले भविस झन थर्थरा। लइका ल कर सोना खरा। सिल्हट कलम कापी धरा। मतलब समझ स्वातन्त्र के। मत के मनुज युग यन्त्र के। फेरा म झन पर मन्त्र के। जनता तहीं जनतन्त्र के। रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
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प्रवासी मजदूर भइया मजदूर प्रवासी। देखत हँव तोर उदासी। भइया मजदूर प्रवासी। देखत हँव तोर उदासी। सिरजाये शहर नगर ला, तँय छोड़ भये सन्यासी। रेंगे पी जग के हाला। पाँवो मा परगे छाला। दिनदिन भर मिल नइ पाए, रोटी के एक निवाला। दुख बरसे सरलग अइसे, जइसे बादर चउमासी। मुड़ मा बोहे ओ गठरी। औरंगाबाद के पटरी। टकटक ले सबो दिखत हे, रोटी अउ चद्दर कथरी। मन हा बोधावत नइहे आवत हे यार रोवासी। जब ले छाये कोरोना। दुनिया के कोना कोना। सब हें घर मा धन्धाये, तोरे भर हो गे रोना। तँय सावचेत रहिबे गा झन होवय सर्दी खाँसी। देखे निज कुरिया छानी। आँखी मा भर के पानी। सपना के शहर नगर मा, ला के टाँगे जिनगानी। अच्छा होतिस खा लेते गाँवे मा चटनी बासी। रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
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सतनाम आरती होवत्थे गुरु के आरती होवत्थे गुरु के आरती सत भजनों से..होवत्थे गुरु के आरती सत भजनों से सेत सिंहासन मन म मढ़त हे 2 शब्द सुमन चरनन म चढ़त हे 2 लमत्थे सत सुरती लमत्थे सत सुरती संत जनों के..होवत्थे गुरु के आरती सत भजनों से पुरुष पिता आ के हिरदे बिराजे 2 मन प्रफुलित तन आरती साजे 2 नचत्थे भाव भगती पटक पाँव धरती पंथी धुनों मे..होवत्थे गुरु के आरती सत भजनों से हिरदे बिराजे सतगुरु बाबा घासी 2 घट घट वासी गुरू गिरौद निवासी 2 कृपा करे हे महती दिखे हे भाग जगती सत्य गुणों से..होवत्थे गुरु के आरती सत भजनों से होवत्थे गुरु के आरती होवत्थे गुरु के आरती सत भजनों से होवत्थे गुरु के आरती सत भजनों से रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' गोरखपुर,कबीरधाम छत्तीसगढ़
बाल कविता-आमा चर्रक अम्मट आमा लाये हावय मामा इस्कूटी मा धर के युरिया बोरी भर के आमा ल दिस झर्रा कल के धूँका गर्रा फुटे फुटे ल चान डर साबुत ल रख अथान बर दादी आमा छोलय बबा ह गोही खोलय माँ खलहारय धोवय फाँकी ला बगरोवय लाहीं जीजा साला सरसों तेल मसाला रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
'राजा गुरु बालकदास पुकारत हे भाई' सत के सत्ता बर सुमता बाँधी जुरियाई। राजा गुरु बालकदास पुकारत हे भाई। बाबा गुरु घासीदास जताये हे तोला। गुरु अम्मरदास करे हावय अर्पित चोला। सभिमान सिखइया भुजबल महंत के डोला। सुरता कर अँवरा-बाँधा के बारी-कोला। आजो दँउड़य नस नस मा सरहा जोधाई। राजा गुरु बालकदास पुकारत हे भाई। मनखे मनखे ला एक मनइया आवस तैं। भटके मन ला सतराह धरइया आवस तैं। पर के नारी ला मातु कहइया आवस तैं। ये माँस नशा ला दूर रहइया आवस तैं। सुरता कर का संस्कार भरे सफुरा दाई। राजा गुरु बालकदास पुकारत हे भाई। वो भेद विसमता फइलाही हम समता जी। सच ला लिखबो थाम्हे हन हाथ कलम ता जी। धीरज राखे मा जीत हवय झन मन्ता जी। सच आज नही ता काल समझही जनता जी। पाटे बर ऊँच-नीच के हे खँचवा-खाई। राजा गुरु बालकदास पुकारत हे भाई। सद्भभाव सुमत ले मुस्कावय भारत भुँइया। सुख दया मया घर घर पावय भारत भुँइया। संग शुद्ध पवन के लहरावय भारत भुँइया। जग बर संसाधन उपजावय भारत भुँइया। ये पावन पबरित भाव घरोघर पहुँचाई। राजा गुरु बालकदास पुकारत हे भाई। रचना-सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर' ...
'जनता कर्फ्यू-(सरसी-लावणी छंद गीत) 22.03.2020 सुरुज नरायण तहूँ कृपा कर,चरचर ले कर घाम। 'जनता कर्फ्यू'हे हम घर मा,बइठे हन दिल थाम। लटकन के चटकन बीमारी,एती ओती चटकत हे। साधारण सर्दी खाँसी हा,कोरोना कस खटकत हे। चैन टोर के कोरोना के,पाँव करे बर जाम। 'जनता कर्फ्यू'हे हम घर मा,बइठे हन दिल थाम। काल बरोबर कोरोना हा,दुनिया भर मा छा गे हे। भारत भुँइया घलो दुखी चिंतित हे अउ घबरागे हे। शहर गाँव झन फइले पावय,जल्दी लगय लगाम। 'जनता कर्फ्यू'हे हम घर मा,बइठे हन दिल थाम। घर परिवार सगा सोदर ला,कानोकान जतावत हन। शासन के निर्देश काय हे,फोन लगा समझावत हन। सब के सतर्कता ले टल जै,दुख-दायक अंजाम। 'जनता कर्फ्यू'हे हम घर मा,बइठे हन दिल थाम। अन्य देश परान्त ले कोनो,गाँव शहर मा आवत हें। लोगन भिन्न भिन्न माध्यम ले,सत्य खबर पहुँचावत हें। चौदह दिन बर क्वारंटाइन,देख-रेख के काम। 'जनता कर्फ्यू'हे हम घर मा,बइठे हन दिल थाम। भाँप संक्रमण के खतरा ला,भीड़ लगाना वर्जित हे। घुमे-फिरे बर बाहर जाना,छुना-छुवाना वर्जित हे। खेवन खेवन हाथ ल धोवन,घर मा करन अ...
'रे जग बयरी कोरोना' चालिस डिगरी घाम ताव मा,दुबक जबे कोनो कोना। हमला का डरुहाये सकबे रे जग बयरी कोरोना। रोके बर तहनाज प्रशासन,तोर सगा-सैमर मन ला। दुर्राना हे कइसे तोला,अलखावत हे जन जन ला। अभिवादन जोहार नमस्ते,जानत हवन हाथ धोना। हमला का डरुहाये सकबे रे जग बयरी कोरोना। जतका माध्यम हे बगरे के,रोड रवन हे नाके के। स्वस्थ सुरक्षित तैनाती हे,पहिचाने के ताके के। जल्दी धरके फूट इहाँ ले,डिस्पोजल पतरी दोना। हमला का डरुहाये सकबे रे जग बयरी कोरोना। -सुखदेव सिंह'अहिलेश्वर'