समरसता के फाग
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                        "सरसी छंद"

ढोल नँगाड़ा बाजै गावन,समरसता के फाग।
भेद भरम के परे नींद ले,मनखे जावय जाग।

रुखराई ला काट होलिका के सँग देथन बार।
बुरा न मानो होली कहिके,पीथन झारा झार।

मंद माँस पी खा बउराथन,     ए कइसे संस्कार।
कारज के पहिली कारज ला,लेवन छाँट निमार।

अंतस के बन कचरा बारै,खोजन अइसे आग।
भेद भरम के परे नींद ले,  मनखे जावय जाग।

रंग लगइ हे तभे सार्थक,नइ खिसियाइस गाल।
नहितो बस टीका भर धारन,सँगवारी के भाल।

खोर गली मा भड़भड़ भड़भड़,उरहा धुरहा चाल।
आँखी कान नाक बरकाके,     छींचन रंग गुलाल।

कुमता के दुरमित ला टारन,छेड़ सुमत के राग।
भेद भरम के परे नींद ले,   मनखे जावय जाग।

दूअर्थी गाना झन बाजय,    होवय झन हुड़दंग।
लइकन सीखै झन सियान ले,ये अलकरहा ढंग।

होली आथे सम रस लाथे,ना की मदिरा भंग।
प्रेम भाव ले भिंजै तन मन, होली के रस रंग।

लाड़ू सही बँधाजै सुनता,धरन सुमत के पाग।
भेद भरम के परे नींद ले,मनखे जावय जाग।


रचनाकार:-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
                      गोरखपुर,कवर्धा
                      02/03/2018




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